यूपी लोक सेवा आयोग की भर्तियों की सीबीआई जाँच में जाँच अधिकारियो को करना पड़ेगा मुश्किल का सामना , आयोग के गोपन विभाग से सबूत जुटाना होगा मुश्किल

उप्र लोकसेवा आयोग की पांच साल में हुई भर्तियों की सीबीआइ जांच का हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद रास्ता साफ हो गया है। अब शीघ्र ही जांच शुरू होने पर भर्तियों में धांधली का सच उजागर होगा लेकिन, जांच अधिकारियों को कुछ मुश्किलों का भी सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों से पूछताछ पर कोर्ट ने रोक लगा रखी है। भर्तियों से संबंधित अधिकांश दस्तावेज आयोग के गोपन विभाग से ही मिलने हैं। ऐसे में आयोग की समिति से पूछताछ के बिना इन दस्तावेजों को प्राप्त करना भी आसान नहीं होगा।

गौरतलब है कि आयोग के अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह यादव और सदस्यों की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूछताछ पर रोक का आदेश देकर याचियों को कुछ राहत दी है। वहीं, सीबीआइ जांच पर कोई आपत्ति भी नहीं जताई है। कोर्ट ने सरकार से इस जांच के आधार जानने के लिए तथ्य जरूर मांगे हैं। ऐसे में भर्तियों पर लगे गंभीर आरोपों की हकीकत जानने के लिए सीबीआइ को आयोग आने से पहले होमवर्क भी मजबूत करना होगा।
प्रतियोगी छात्रों का कहना है कि आयोग के पूर्व अध्यक्ष डा. अनिल यादव ने गोपन विभाग में तमाम सेक्सन प्रभारियों को मनमाने ढंग से नियुक्त कर रखे थे और उन्हीं के माध्यम से भर्तियों में धांधली की गई थी। आरोपों का सच भी अभिलेखीय आधार पर गोपन विभाग से पता लगना है। इसके लिए सीबीआइ को अध्यक्ष और सदस्यों से पूछताछ करनी ही होगी जबकि यह दीगर है कि इस पूछताछ का स्वरूप क्या होगा।

कंप्यूटर में दर्ज दस्तावेज होंगे जांच में मददगार : 
भर्तियों की जांच के दौरान सीबीआइ के अधिकारी उस कार्यालय की भी छानबीन कर सकते हैं जहां तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव बैठते थे। क्योंकि उसी कार्यालय में अध्यक्ष और सदस्यों की बैठकों में कई ऐसे निर्णय हुए थे जिन पर प्रतियोगी छात्रों ने एतराज जताया था।
तत्कालीन अध्यक्ष के निर्णयों से जुड़े अहम तथ्य उनके कंप्यूटर में भी होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि सीबीआइ जांच की दिशा को आगे बढ़ाने के लिए कंप्यूटर की हार्ड डिस्क को कब्जे में ले सकती है।

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